मराठ्यांच्या इतिहासाची साधने खंड तेरावा (थोरले माधवराव)

                                                                                   पत्रांक १४८.                                                    

१६४९ कार्तिक शुद्ध १५.                                                           श्री.                                                          नकल

स्वस्तिश्री शिका राजाचा.

स्वस्तिश्री राज्याभिषेक शके ५४ प्लवंग नाम संवत्सरे कार्तिक शुद्ध पौर्णिमा सौम्यवासरे, क्षत्रियकुलावतंस श्रीराजा शंभु छत्रपती स्वामी यांनीं वेदशास्त्रसंपन्न राजश्री त्रिंबकभट बिन सखंभट उपनाम थेटे गोत्र अत्री स्तव्य कडुस, यांसी दिल्हे इनामपत्र ऐसीजेः-

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तुम्हीं अहमदनगरचे मुक्कामी स्वामीसन्निध विदित केलें कीं, “आपण पुरातन राजाश्रित, कुटुंबवत्सल, योगक्षेमाची अनकूलता नाही. महाराज धर्मपरायण आहेत. कांहीं स्वास्ता करून दिधलियानें महाराजास कल्याण चिंतून राहूं." म्हणोन. त्यावरून तुम्हीं बहुत थोर, पुरातन, आश्रित, यास्तव स्वामींनीं तुम्हांस मौजे सावुरडी तो वाडें प्रति जुन्नर हा गांव देहु येक इनाम कुलबाब कुलकानु हाली पट्टी पेस्तरपट्टी जलतरु पाषाण निधि निक्षेपसहित खेरीज हकदार व इनामदार करून इनाम सर्वमान्य करून दिल्हा असे. अलाहिदा सनदा सादर आहेत. तरी मौजे मा।री पूर्वमर्यादेप्रों आपले स्वाधीन करून घेणें आणि इनाम तुम्हीं व तुमचे पुत्रपौत्रादि वंशपरंपरेने अनभऊन सुखरूप राहणे. जाणिजे. निदेश समक्ष मोर्तब, मर्यादेयं विराजते.

रुजु सुरनवीस.

तेरीख १४
रबिलावल सुहुर चन समान बार.

सुरु सुद बार.

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