मराठ्यांच्या इतिहासाची साधने खंड वीसावा (शिवकालीन घराणी)

लेखांक १६                                                                                                                                  १५८८ भाद्रपद                                                                                                            
                                                                                     

उत्तमगुणपरिपूर्ण निर्गवियासिरोमणि देवब्राह्मणप्रतिपालक माहाराज
राजश्री पंताजी गोपिनाथ स्वामी गोसावीयाचे सेवेसी

.॥2 1 विनति सेवके हरि दिनानाथे सिरसाष्टांग नमस्कार विनति उपरि एथील क्षेम त॥ छ माहे रबिलोवल परयत क्षेम असो गोसावियानी आपले क्षेम लेहावया निरोप दिल्हा पाहिजे यानतर स्वामीनी पत्र लिहिली पाऊन समाचार वर्तमान मनासी आला लिहिले की तुह्मी सत्वर एणे कार्यप्रयोजन उदड आहे वा एते वेळेस र॥ बहिरो नारायणास बराबरी घेऊन एणे ह्मणउन लिहिल तरी आमचे पुतणे वेकोजीस बोरगावास पाठविले आहे व नागपचमी जाहालियावरी त्याचा वर्तमान आह्मास कळेल व तुह्मी लिहिले की र॥ अबाजीपतास कागद पावते केले की नाही ह्मणउन लिहिले तरी रा। अबाजीपतास हि माणूस पाठविले आहे त्याचा वर्तमान आठ पधरा रोजा एईल वा कागद हि घेऊन एणे ह्मणउन आज्ञा केले तरी कागदपत्र काही आह्मापासी वा रा। बहिरोपंतापासी नाहीत कागदपत्र हुकेरीस आहेत त्यास हि माणूस पाठविले आहे ऐसा वर्तमान आहे त्याचा मार्ग लक्षीत आहो याउपरि स्वामीने आज्ञा केली जे तुह्मी एणे ह्मणउन लिहिले तरी वर्तमान ऐसा आहे त्याचे उत्तर ए तोवरी आज्ञा जाहाली तरी राहून स्वामीने तैसे च एणे ह्मणऊन आज्ञा केली तरी एऊन बहिरोपंताचे उत्तर ए तोवरी वाट पाहातो त्याच उत्तर ए तोवरी मार्ग लक्षीत आहो उत्तर आलियाने स्वार होऊन एऊन कागदाचे उत्तर पाठऊन दिल्हे पाहिजे. स्वामी ह्मणतील जे गावी राहून कुलकर्णाचा कारभार करितो तरी काही गावीचे कारभार करीत नाही रा। बहिरोपताचे उत्तर ए तोवरी वाट पाहातो मग स्वार होऊन एऊन स्वामीने अभिमान धरिला आहे तो सिधी च पावेल वा अबाजीपंत हि तुमचे पत्र पावलियावरी ते हि सीर्घ च एतील जाणिजे कृपा निरंतर असो दीजे हे विनति

हे विनति

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