मराठ्यांच्या इतिहासाची साधने खंड तिसरा ( १७०० -१७६०)

[५३८]                                                                     श्री.                                                                

वेदशास्त्रसंपन्न राजमान्य राजश्री वासुदेव दीक्षित स्वामीचे सेवेसी :-
विद्यार्थी बाळाजी बाजीराव प्रधान नमस्कार विनंति उपरि येथील कुशल जाणून स्वकीय कुशल लिहीत जावें. विशेष. यानंतर सांप्रत तुमचें पत्र येऊन वर्तमान कळत नाहीं. तरी सविस्तर अर्थ श्रीकडील वगैरे लेहून पाठवणें. येथील अर्थ कांही विशेष लिहिजेसा नाहीं. काशीकडील वर्तमान कांही आलें असेल तर ल्याहावें. चित्त उद्विग्न आहे. बहुत काय लिहिणें. हे विनंति.


[५३९]                                                                     श्री.                                                                

वेदशास्त्रसंपन्न राजश्री वासुदेव दीक्षित स्वामीचे सेवेसी :-
विद्यार्थी बाळाजी बाजीराव प्रधान नमस्कार विनंति उपरि येथील कुशल जाणोन स्वकीय कुशल लिहिणें. विशेष. का पैठणी व वडवाळी येथें श्रीची देवालयें पुरातन आहेत. तेथील देव भूमिगत होते ते सांपडले आहेत. त्यांची स्थापना देवालयांत करावयाची आज्ञा केली आहे. त्यास, देवालयाजवळ मुसुलमान लोक राहतात ते दूर होऊन व देवालयास व ब्राह्मणास कोण्हेविशी उपसर्ग न लागे ते गोष्ट करणें. येविशीं महानगरचे अधिपत्यास सांगोन देवाब्राह्मणास किमपि उपद्रव न लागे ते करणें. जाणिजे. छ २ साबान. बहुत काय लिहिणें. मोगलांची पत्रें पैठणचे फौजदारास घेऊन पाठवणें. छ मजकूर. हे विनंति.

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