संस्कृत भाषेचा उलगडा

स्य उच्चार करणाऱ्या समाजाच्या भाषेतील प्रथमेचे एकवचन स्य: वैदिकभाषेत येऊन बाकीची रूपे त्य उच्चार करणाऱ्याच्या भाषेतील आली. सर्व साधनिका देव शब्दाप्रमाणे.

                           स्त्रीलिंग

       १                २                ३
१     त्या             त्ये              त्या:
२     त्याम्          त्ये              त्या:
३     त्यया         त्याभ्याम्       त्याभि:
४    त्यास्यै           ' '             त्याभ्य:

त्या व रमा यांच्या रूपात भेद इतकाच कीक स्यै, स्या: स्याम् या प्रत्ययामागे रमा शब्दाचे रमा हे आकारान्त अंग असते व त्या शब्दाचे रय हे अकारान्त अंग असते. म्हणजे त्या हा शब्द भाषितपुंस्क धरला गेला. त्यास्यै न होता त्यस्यै होते. याचे कारण असे की, स्यै वगैरे प्रत्ययच स्त्रीलिंगदर्शक असल्यामुळे त्य या अंगाला आ हा स्त्री प्रत्यय जोडला नाही. रमा, रामा, इत्यादी शब्द स्वतंत्र स्त्रीलिंगी गणल्यामुळे, त्यांच्या आकारान्त अंगाला स्यै वगैरे स्त्रीलिंगी प्रत्यय लागतात.

           नपुंसकलिंग

          १                   २              ३
        १ व २ त्यत्        त्ये            त्यानि

                बाकी रूपे पुल्लिंगवत्

नपुंसकलिंगी स्य सर्वनामाची त्यत् ही खूण इथे नाही. याचे कारण असे की स्य उच्चार करणाऱ्यांच्या समाजात नपुंसकलिंग निर्माण झाले नव्हते. त्यत्, रये, त्यानि या तीन रूपात दोन भाषातल्या रूपांचे मिश्रण आहे. केवळ नपुंसकलिंगी भाषा बोलणारा एक पूर्ववैदिक जुनाट समाज होता म्हणून मागे सांगितले. त्या समाजात त्यत् हे सर्वनामरूप होते व पुल्लिंगी भाषा बोलणाऱ्यांच्या समाजात त्य हे प्रातिपदिक होते. पहिला समाज त्यत् हे सर्वनाम असे चालवी :

             १               २                  ३
          त्यत्             त्यती             त्यन्ति
आणि दुसरा समाज त्यं, त्ये, त्यानि अशी रूपावली रची. दोहोंचे संमिश्रच होऊन

         त्यत्               त्ये               त्यानि

ही रूपे मिश्र जी वैदिकभाषा तीत आली.

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