मराठ्यांच्या इतिहासाची साधने खंड तिसरा ( १७०० -१७६०)

[४०२]                                                                       श्री.                                                               ५ मे १७५२.

राजश्रीया विराजित राजमान्य राजश्री आपली अप्पाजी गणेश व गोपाळ गोविंद स्वामी गोसावी यांसी :-
पोष्य बाळाजी बाजीराव प्रधान नमस्कार विनंति उपरि येथील कुशल जाणोन स्वकीय कुशल लिहिणें. विशेष. वेदशास्त्रसंपन्न राजश्री बाळकृष्ण दीक्षित हे श्रीमंत आहेत. त्यांस मोगलाई अम्मल तिहा, तेव्हांपासून सर्व यांचे आज्ञेप्रमाणें वर्तून, त्यांस मान्यता देत गेले. सांप्रत तो आमचा अम्मल जाहला. तेव्हां हें तुह्मांस सांगतील तें यांचे विचारें करीत जाणें. यांसी किमपि दुसरा विचार न दाखवितां विशेष पहिल्यापेक्षां चाले ते गोष्ट करणें. जरूर जरूर याप्रमाणें करणें. छ १ रज्जब. हे विनंति, शके १६७४.

 

 

[४०३]                                                                       श्री.                                                              ४ जुलई १७५२.

वेदशास्त्रसंपन्न वेदमूर्ति राजश्री वासुदेव दीक्षित स्वामीचे सेवेसी :-
विद्यार्थी विसाजी दादाजी साष्टांग नमस्कार विनंति. येथील कुशल ता आषाढ शुध्द ४ मु॥ पुणें जाणून स्वकीयलेखन करावयाची आज्ञा केली पाहिजे. विशेष. आपण श्रीहून आल्यावरी आशीर्वादपत्र येऊन वर्तमान कळलें नाहीं. तरी सदैव पत्रीं सांभाळ करावा. वरकड वर्तमान श्रीमंतांनी लिहिलें आहे त्यावरून विदित होईल. श्रीमध्यें तीर्थरूप मातुश्री आहेत व दादा आहेत. त्यांचें वर्तमान लिहिलें पाहिजे. बहुत काय लिहिणें. कृपालोभ असों दीजे. हे विनंति.

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